Saturday, June 28, 2008

रॉक गार्डन



हम सब अपना एक रॉक गार्डन बनाते हैं

अनुभवों के कबाड़ से

चुनकर लाते हैं

काई जमीं यादें

उन्हें रगड़ कर साफ करते हैं

जिंदगी के सांचे में फिर से सजाते हैं

और बच्चों पर चिल्लाते हैं

देखो बेवकूफ, तुमने कबाड़ समझकर बाहर डाल दी थी जिसकी चारपाई उसके पास अब भी बहुत कुछ ऐसा है

जो तुम्हारी आंखें चुंधिया सकता है

और कर सकता तुम्हारी नई दुनिया को भी फीका

तुम्हारे मल्टीप्लेक्स और मॉल की भीड़ को जब जरूरत होती है सकून की तब वह अपनी जड़ों को खोजेने मेरे पास ही आएगी

मैं बुढ़ापा नहीं

यादों का रॉक गार्डन हूं

सबको आना होगा मेरे पास

यह दम्भ नहीं

मेरा आकर्षण बोल रहा है।

-सुधीर राघव

Sunday, June 22, 2008

chandigarh

सोहणी सिटी चंडीगढ़ में कुछ तसवीरें और बदलने वाली हैं। पहली तो यह कि सभी सरकारी कार्यालयों से कैश काउंटर खत्म होने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में पैसे जमा करवाने पर पब्लिक को बाबुओं के नखरों से भी दो-चार होना पड़ता था। यह भी भरोसा नहीं था कि जमा कराया पैसा तत्काल एकाउंट में जा रहा है या नहीं। इस तरह के कई घोटाले भी सामने आ चुके हैं। अब पब्लिक संपर्क केंद्रों पर पैसे जमा करा सकेगी। इसके अलावा संपर्क सेंटरों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।इसके अलावा चंडीगढ़ एयरपोर्ट की तस्वीर भी बदलने जा रही है। अब चेक-इन के लिए आपको लाइनों में नहीं लगना होगा। एयरपोर्ट पर ऐसी मोबाइल मशीनें और क्रिआस्क लगाए जा रहे हैं, जहां से आपको अपना बोर्ड पास मिल सकेगा। इसके अलावा सीट चुनने का विकल्प भी आपको सीधे मोनिटर पर मिलेगा।

Friday, June 20, 2008

kavita

बहाना
सोचता हूं, घर से बाहर निकलूं
पर कहां?
घर से बाहर हैं घरों की कतारें
इनके बीच सड़कों पर रेंगती भीड़
कुछ पेड़ हैं, जो लगा दिए गए हैं किनारे।
सोचता हूं, इस शहर से बाहर चलूं पर कहां?
शहर के बाहर बसे हैं बहुतेरे शहर
इनके बीच दौड़ती है भूख इनसान का भेस बनाकर
कुछ खेत हैं, जो चढ़ने वाले हैं किसी सेज (अब सेठ नहीं) की नजर।
सोचता हूं, देश से बाहर उड़ूं पर कहां?
देश के बाहर हैं बहुत से देश
इनके बीच के समन्दर पर तभी पुल बनता है जब जीतनी हो कोई जंग
कुछ कश्तियां हैं पर अलग हैं सबके भेस।
यह मेरी जड़ता है
या मुझमें नहीं है इतनी भूख कि निकल सकूं
इस घर
इस शहर
या
देश से बाहर।
-सुधीर राघव

Wednesday, June 18, 2008

hello chandigarh

इस शहर की खुली हथेली पर
चौड़ी सड़कें
जैसे मजबूत भाग्य रेखा
इन पर चल कर
युवा खोज लाते हैं
अपनी मंिजल
यह मैं नहीं कहता
लोकसेवा
आईआईटी
एमबीए
एग्जाम के हर साल
आंकड़े बोलते हैं


is shahar ki khuli hatheli par

chaurhi shadken

jese majboot bhagy rekha

in par chal kar

yuva khooj late hain

apni manjil

ye main nahi kehata

Civil Services

IIT

MBA

exam ke har sal ankde

boolte hain