
हम सब अपना एक रॉक गार्डन बनाते हैं
अनुभवों के कबाड़ से
चुनकर लाते हैं
काई जमीं यादें
उन्हें रगड़ कर साफ करते हैं
जिंदगी के सांचे में फिर से सजाते हैं
और बच्चों पर चिल्लाते हैं
देखो बेवकूफ, तुमने कबाड़ समझकर बाहर डाल दी थी जिसकी चारपाई उसके पास अब भी बहुत कुछ ऐसा है
जो तुम्हारी आंखें चुंधिया सकता है
और कर सकता तुम्हारी नई दुनिया को भी फीका
तुम्हारे मल्टीप्लेक्स और मॉल की भीड़ को जब जरूरत होती है सकून की तब वह अपनी जड़ों को खोजेने मेरे पास ही आएगी
मैं बुढ़ापा नहीं
यादों का रॉक गार्डन हूं
सबको आना होगा मेरे पास
यह दम्भ नहीं
मेरा आकर्षण बोल रहा है।
-सुधीर राघव
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