Saturday, June 28, 2008

रॉक गार्डन



हम सब अपना एक रॉक गार्डन बनाते हैं

अनुभवों के कबाड़ से

चुनकर लाते हैं

काई जमीं यादें

उन्हें रगड़ कर साफ करते हैं

जिंदगी के सांचे में फिर से सजाते हैं

और बच्चों पर चिल्लाते हैं

देखो बेवकूफ, तुमने कबाड़ समझकर बाहर डाल दी थी जिसकी चारपाई उसके पास अब भी बहुत कुछ ऐसा है

जो तुम्हारी आंखें चुंधिया सकता है

और कर सकता तुम्हारी नई दुनिया को भी फीका

तुम्हारे मल्टीप्लेक्स और मॉल की भीड़ को जब जरूरत होती है सकून की तब वह अपनी जड़ों को खोजेने मेरे पास ही आएगी

मैं बुढ़ापा नहीं

यादों का रॉक गार्डन हूं

सबको आना होगा मेरे पास

यह दम्भ नहीं

मेरा आकर्षण बोल रहा है।

-सुधीर राघव

No comments: