हम लोग : अकु श्रीवास्तव
मुंबई में आतंकी हमले के दिन से ही रह-रह कर मोबाइल और कम्युनिटी ब्लोग्स
पर कुछ संदेश लगातार आ रहे हैं. इनमें से एक जो सबसे ज्यादा आया, वो
था-राज ठाकरे और उनकी 'बहादुर' सेना कहाँ है? उन्हें बता दे कि आतंकियों
से भिड़ने दो सौ से अधिक एनएसजी के कमांडो दिल्ली से मुंबई गए, उनमें से
ज्यादातर उत्तर और दक्षिण भारतीय थे. ये कमांडो मुंबई पहुंचे ताकि आप लोग
आराम कि नींद सो सकें. जय हिंद...
एक तरफ़ जब देश की आथिर्क राजधानी में देश के दुश्मन लोगों को चुन-चुन कर
मर रहे हों. देश की सेना, सुरक्षा बल और पुलिस उनसे जूझने में अपनी जान
कुर्बान कर रहे हों, तो ऐसे एसएमएस हमें क्या संदेश देते हैं. संदेश
भेजने वालों को लगता होगा कि वह बहुत बड़ा कम कर रहे हैं, ताकि इनमें से
अक आधा संदेश घूम-फ़िर करके मुंबई में राज ठाकरे के पास भी पहुंचे और
उन्हें उनकी गलती का एहसास कराये. उन्हें याद दिलाए कि दो-तीन महीने से
उन्होंने और उनकी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ
जो अभियान छेड़ा है, ग़लत है। रलवे की परीक्षा देने गए उत्तर भारतीयों की पिटाई गलत है। राहुल राज को महाराष्ट्र की पुलिस ने मार गिराया, गलत है।...पर सवाल उठता है कि ऐसे संदेश जब देश देश पर हमले जैसी स्थिति हो, उस समय, उस मौके पर कितने वाजिब हैं? क्या जब देश पर कोई आंच आती है तो हमारे दिलेर जवानों में क्षेत्रीयता की भावना होती है, कतई नहीं। वो अपनी जान हथेली पर रख कर देश की रक्षा करते हैं। ऐसे संदेश भेजने वाले क्या एटीएस मुखिया हेमंत करकरे, एसपी अशोक काम्टे, और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर की शहादत को भूल जाना चाहते हैं।
इसी तरह जब एक ऐसा भी संदेश होता है कि डॉ. मुशीरुल हसन, मुलायम, लालू, अमर सिंह, प्रकाश करात से कहें कि वे मुंबई के गिरफ्तार आतंकी के बचाव के लिए भी पैसा इकट्ठा करें, जैसा कि उन्होंने बटला हाउस मुठभेड़ में किया था, से क्या होगा? ऐसे संदेश भेजने वाले किनके लिए ऐसी बातें कर रहे हैं. क्या ऐसे संदेश भेजने वाला इंडियन जिन पर निशाना साध रहा है, उनको अपने जैसा हिन्दुस्तानी बना पाएगा। ऐसा नहीं है कि ऐसे संदेश सिर्फ चंडीगढ़ में ही चले। ये सात समुंदर पार से, काशी से और जम्मू-कश्मीर से आए। सभी जगह यह काम हुआ और किसी को फायदा हुआ हो या न, मोबाइल कंपनियों की जेबें जरूर भरीं।
ऐसे संदेश भी कई तरह के लोग भेजते हैं। एक वे जो क्षणिक आवेश में आकर ऐसा करते हैं और दूसरों के दुःख में हल्की-फुल्की खुशी तलाशते हैं। उन्हें लगता है कि अब वे मुश्किल में हैं, मजा लो। जैसे एक ही बिल्डिंग के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे भाइयों में से एक के हिस्से में डकैत आ जाएं और बाकी जानने के बावजूद अपने-अपने कमरों में अंत्याक्षरी खेलने में मशगूल रहें। सुबह हुई बच्चों की आपसी तू-तू, मैं-मैं की वजह से बाहर न निकलें। दूसरे, ऐसे लोग होते हैं, जो विचारधारा के उद्देश्य के साथ ऐसे संदेश भेजते हैं। इनमें छुटभैय्ये नेता से लेकर सांसद तक होते हैं और ज्यादातर सत्ता विरोधी पार्टी से जुड़े होते हैं। आजकल ऐसे लोगों में कुछ वे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं। जब कंधार कांड हुआ था तो यही काम दूसरी पार्टी से जुड़े लोग करते रहे थे। अभी जब आर्थिक मंदी हुई तो वामपंथी मित्रों ने ऐसे संदेश खूब भेजे कि उनकी बदौलत बैंक गिरवी नहीं हुए, अन्यथा सरकार ने तो बर्बादी का पूरा इंतजाम कर दिया था। समय-समय पर ऐसे लोग बदलते रहते हैं। पर ऐसा लगता है कि ज्यादातर लोग अपनी भड़ास निकालने के लिए ऐसा करते हैं। वे अपना गुस्सा किसी राज ठाकरे पर निकालने की कोशिश करते हैं कि शायद उग्रवादियों ने महाराष्ट्र या मुंबई को इसलिए चुना कि उन्हें पता है कि महाराष्ट्र में रहने वाला मानुष एकजुट नहीं है। वह कहीं मराठी है तो कहीं उत्तर भारतीय। उसको अंधेरे में रख अपना काम किया जा सकता है। लेकिन अगर आप गंभीरता से सोचें तो ऐसे लोग कोई बहुत दूर की सोचने की कोशिश नहीं करते। जाने-अनजाने उनकी सोच वैसे ही छोटी होती जाती है, जिस पर वे टिप्पणी कर रहे होते हैं। परिवार और कभी-कभी प्रदेश हित उन्हें अपना लगता है। देशहित की सोच तक बात नहीं पहुंचती। ऐसा नहीं है कि उनमें राष्ट्रप्रेम कहीं से कम है। पर कभी-कभार ऐसी टिप्पणी कर देते हैं कि उससे राष्ट्र का अहित हो जाता है। जैसे बटला हाउस शूटआउट के समय ऐसे एसएमएस भेजे गए, जिससे शायर कैफी आजमी के शहर का एक समुदाय ही निशाने पर आ गया। ऐसे लोगों को व्यक्तिगत सोच से ऊपर अपने राष्ट्र के बारे में सोचना चाहिए।
अब सवाल उठता है कि ऐसे संदेश क्या सचमुच राज ठाकरे सरीखे नेताओं को सीख दे पाएंगे? लेकिन जाने-अनजाने वो लोग जो देश के लिए सोचते हैं, उनके कदम रोकने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों के संदेश आतंकियों के समर्थकों के यह जरूर बता जाते हैं कि हम बंटे हुए हैं और यह जगह आपके लिए मुफीद है। आज जब सचमुच मिलकर संकट से लड़ने का वक्त है, आपसी भाईचारे से रहने का वक्त है, हिन्दू की जमीन पर मुसलमान भाई को नमाज पढ़वाने की सुविधा देने का वक्त है, छोटे-छोटे मतभेद भूलकर एक-दूसरे की सहायता और देश को जोड़ने का वक्त है तो ऐसे एसएमएस भेजने से ज्यादा जरूरी होगा कि इस सुविधा का लाभ रक्तदान, सूचनाएं देने-लेने, विचारोत्तेजक सूक्तियों और कभी-कभी होठों पे हंसी लाने वाले चुटकुलों के लिए ही हो तो अच्छा, नहीं तो एकता के बंधन के धागों में गांठ पड़ती जाएगी।
वैसे इस मौके पर एक एसएमएस आपको जरूर सोचने के लिए विवश कर सकता है। संदेश का हिंदी अनुवाद है, - कुछ क्षणों के लिए हम उनके लिए चिंतित हो सकते हैं, जो बोट से आए। ...लेकिन हमें सचमुच उनके लिए जरूर चिंतित होना होगा, जो वोट से आते हैं। जागो।।
Tuesday, December 2, 2008
Tuesday, October 14, 2008
सरोगेट मदर
यह खबर आपको हैरान कर सकती है। चंडीगढ़ में कुछ लड़किया किराए पर कोख देने को करियर के तौर पर अपना रही हैं। इस काम के लिए उन्हें २५ से ३० लाख रुपए तक मिल रहे हैं। खासकर इंटरनेट के माध्यम से वे ग्राहक भी ढूंढती हैं। सेक्टर ३३ के संत मेमोरियल नर्सिंग होम की डाक्टर उमेश जिंदल ने बताया कि उनसे कई लोग इसके लिए संपर्क करते हैं। ऐसे तीन केस सफल भी हो चुके हैं। इस खबर को बिस्तार से हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में पढ़ जा सकता है। रिपोर्ट है तरुणी गांधी की।
Tuesday, September 30, 2008
एक है जर्मन लड़की
चंडीगढ़ के होटल ताज से कुछ युवकों ने एक जर्मन युवती का अपहरण कर लिया। शनिवार रात दो बजकर दस मिनट पर यह वारदात हुई। इसी दिन शहर में विश्व पर्यटन दिवस प्रशासन जोर-शोर से मना रहा था। आरोपी एक स्कॉर्पियो में थे। लड़की अपने दोस्तों के साथ कॉफी पीने रात को होटल पहुंची थी। रविवार को युवकों ने लड़की को सेक्टर २० में उसके दोस्त के घर के पास वापस छोड़ दिया। लड़की १७ के पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई कि युवक उसका अपहरण करके ले गए थे और उन्होंने उससे सामूहिक बलात्कार की कोशिश भी की। इसके बाद पुलिस हरकत में आई। दो युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया है। बाकी आरोपियों के नाम का भी खुलासा हो चुका है। सभी जमींदार परिवारों के हैं। अंबाला के आसपास के गांवों के रहने वाले हैं। ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं और कोई काम धंधा भी नहीं करते। युवकों का कहना है कि वे लड़की को लेकर स्थान बदलते रहे, क्योंकि वह चीखती थी और कोई आ न जाए इस डर से वे जगह छोड़ कर दूसरी जगह चल देते थे। अपहरण में जिस स्कॉर्पियो का इस्तेमाल किया गया वह छछरौली (यमुनानगर) के मार्केट कमेटी के चेयरमैन की बताई जाती है।
Tuesday, September 16, 2008
नंबर वन चंडीगढ़
सोहणी सिटी के लिए यह अच्छी खबर है। प्रतिव्यक्ति आय में चंडीगढ़ फिर नंबर वन हो गया है। वर्ष २००७-२००८ के एक त्वरित अनुमान के अनुसार यूटी की प्रतिव्यक्ति आय १,१०,६७६ रुपए वार्षिक हो गई है। वर्तमान कीमतों के आधार पर चंड़ीगढ़ ने ११.५० फीसदी की बढ़ोतरी की है। चंडीगढ़ में सबसे तेजी से रिटेल और सर्विस सेक्टर प्रगति कर रहा है। प्रतिव्यक्ति आय की दृष्टि से चंडीगढ़ के बाद गोवा का नंबर है। यह आंकड़े डायरेक्टरेट ऑफ इक्नोमिक्स एंड स्टेटिस्टिक्स ने जारी किए हैं। हमारे पड़ोस में हरियाणा से आगे पंजाब चल रहा है। हरियाणा में जहां प्रतिव्यक्ति आय ४९०३९ रुपये वार्षिक हो गई है, वहीं पंजाब में यह मात्र ४०५६६ रुपये ही है। हिमाचल में यह सिर्फ ३६७८२ मगर दिल्ली में ६६७२८ रुपये है। इस संबंध में विस्तार से दैनिक हिन्दुस्तान के मंगलवार के अंक में जाना जा सकता है।
Friday, September 12, 2008
पीयू पर सोपू और एबीवीपी का कब्जा
पंजाब यूनिवर्सिटी के चुनाव में सोपू और एबीवीपी के गठबंधन ने विपक्ष का सफाया कर चारों सीटों पर कब्जा कर लिया। सोपू के साहिल नंदा प्रेजिडेंट, एबीवीपी की पारुल चौधरी वाइस प्रेजिडेंट और प्रशांत शर्मा सचिव तथा सोपू के दीपक ठाकुर संयुक्त सचिव चुने गए। यह चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। जीतने वाले पदाधिकारियों ने अपनी रणनीति का भी खुलासा कर दिया है। उनका कहना है कि वे पीयू को सेंट्रल स्टेटस दिलाने के लिए संघर्ष करेंगे।
इस बारे में दैनिक हिन्दुस्तान के शनिवार के अंक में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। साथ ही पढ़ी जा सकती हैं रवि प्रकाश की रिपोर्ट।
इस बारे में दैनिक हिन्दुस्तान के शनिवार के अंक में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। साथ ही पढ़ी जा सकती हैं रवि प्रकाश की रिपोर्ट।
Tuesday, August 19, 2008
आज दुआ कीजिए
बीजिंग ओलंपिक में आज विजेंद्र और जीतेंद्र क्वार्टर फाइनल मुकाबले में क्रमशः इक्वाडोर के कार्लोस गोजोरा और रूस के जेओर्जी बालिक्शन से भिड़ेंगे। भिवानी के इन दोनों रणबांकुरों के लिए आज की जीत ही पदक का सपना साकार कर सकती है। इसलिए इनके लिए दुआ की जानी चाहिए। जितेंद्र का मैच शाम ०४ बजकर ४६ मिनट पर और विजेंद्र का मैच शाम ६ बजकर १६ मिनट पर होगा।
Wednesday, July 30, 2008
वॉयस आफ इंडिया

वॉयस आफ इंडिया मालदीव में डूब चुकी है। हमारा होनहार इस्मीत अब नहीं रहा। गायन की उसकी अलग शैली की प्रशंसा तो स्वर सम्राग्यी लता मंगेशकर भी कर चुकी हैं। लुधियाना के इस सपूत के निधन पर अब सब जगह शोक है। उसका जन्म २ सितंबर १९८९ को पंजाब के लुधियाना शहर में हुआ। नवंबर २००७ में वह स्टार वॉयस आफ इंडिया का विजेता रहा। वह मुंबई के एमएनसी कालेज में बीकॉम द्वितीय वर्ष का छात्र था। देश ही नहीं विदेश में भी उसके चाहने वाले थे।इस्मीत को श्रद्धांजलि देते हुए सरदार अंजुम ने कुछ पंक्तियां कही हैं-
इस्मीत सबका मीत बना और खो गया।
कुछ तो बता दे आस्मां ये कैसे हो गया।
(यह पूरी कविता दैनिक हिंदुस्तान में देखी जा सकती है।)
साथ ही संजीव द्वारा बनाया गया स्कैच। बस ऐसी यादें अब शेष हैं इस्मीत तुम्हारी।
Sunday, July 13, 2008
अच्छी पहल
सुंदरता एक खास समय पर खास लोगों की सृजनता का नतीजा हो सकती है, मगर यह कायम रहे इसके लिए सतत प्रयास जरूरी हैं। यह अच्छी बात है कि इस सोहणी सिटी की खूबसूरती को और बढ़ाने के लिए प्रयास भी लगातार होते रहे हैं। इसलिए इसका आकर्षण भी लगातार बढ़ता रहा है। शहर में सार्वजनिक धूम्रपान पर रोक लगे आज पूरा एक साल हो गया। इसके अच्छे नतीजे भी निकले हैं। शहर की आब-ओ-हवा साफ है। जगह-जगह आपको बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े पड़े नहीं मिलते। कानून को न मानने वाले अपराधी प्रवृति के लोग हमेशा ही रहते हैं, वे कानून बन जाने पर भी इन्हें तोड़ते रहते हैं। कानून मनवाने की चीज नहीं है, कानून आपकी सभ्यता का प्रतीक है। आप अगर इसे मानते हैं तो आप सभ्य हैं। अगर आप नहीं मानते तो आपको इसका अपराधबोध होना चाहिए। आपको यह पता होना चाहिए कि आप क्या विकसित होते समाज में और योगदान कर सकते हैं।
अब चंडीगढ़ को प्लास्टिक मुक्त बनाने की दिशा में भी काम हो रहा है। राज्यपाल रोड्रिग्स ऐसा चाहते हैं। पंजाब इंजीनियरियंग कालेज (कालेज) ने इस दिशा में प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर भी प्रशासन को सौंप दी है। पेक के डायरेक्टर प्रोफेसर मनोज दत्ता और उनकी टीम ने यह रिपोर्ट तैयार की है। अब इस रिपोर्ट को प्रशासन से अनुमति का इंतजार है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि १५ अगस्त को इस संबंध में कोई घोषणा हो सकती है। दो अक्तूबर से यह लागू भी हो सकती है।
अगर यह फैसला ईमादारी से लागू हो जाए तो यह एक अच्छी पहल है। इस तरह के समूह हित के फैसलों को जनता अपना कर्त्तव्य समझकर मानती है तो पूरी सभ्यता विकसित होती है। हमारी सोहणी सिटी देश में विकास के ऐसे ही नए मानक गढ़ सकती है।
अब चंडीगढ़ को प्लास्टिक मुक्त बनाने की दिशा में भी काम हो रहा है। राज्यपाल रोड्रिग्स ऐसा चाहते हैं। पंजाब इंजीनियरियंग कालेज (कालेज) ने इस दिशा में प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर भी प्रशासन को सौंप दी है। पेक के डायरेक्टर प्रोफेसर मनोज दत्ता और उनकी टीम ने यह रिपोर्ट तैयार की है। अब इस रिपोर्ट को प्रशासन से अनुमति का इंतजार है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि १५ अगस्त को इस संबंध में कोई घोषणा हो सकती है। दो अक्तूबर से यह लागू भी हो सकती है।
अगर यह फैसला ईमादारी से लागू हो जाए तो यह एक अच्छी पहल है। इस तरह के समूह हित के फैसलों को जनता अपना कर्त्तव्य समझकर मानती है तो पूरी सभ्यता विकसित होती है। हमारी सोहणी सिटी देश में विकास के ऐसे ही नए मानक गढ़ सकती है।
Sunday, July 6, 2008
सोहणी सिटी में ब्लागर्स की मीट

हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ में एक नई क्रांति दस्तक दे रही है। यह है अभिव्यक्ति की क्रांति। सूचना-तकनीक जगत में आए बदलाव ने लोगों को एक बड़ा मंच उपलब्ध करा दिया है। देश में इंटरनेट यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन संसाधनों ने ब्लागर्स का एक नया समुदाय खड़ा कर दिया है। ये हर विषय पर अपनी बेबाक टिप्पणी देते हैं। दुनियाभर की जानकारियां साझी करते हैं। हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के युवा बड़ी संख्या में अपनी बात बेधड़क कहने के लिए ब्लागिंग कर रहे हैं। ६ जुलाई २००८ को तो पहली बार इस सोहणी सिटी में ब्लागर्स की मीट हुई। सेक्टर ३५ के होटल केसी रेजीडेंसी में हुई इस मीट में हालांकि पहली बार सिर्फ ११ ब्लागर्स ही पहुंचे पर उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग पर सबसे ज्यादा जोर दिया। साथ ही ब्लागिंग की दुनिया के कई बड़े राज भी साझा किए। गौरव शर्मा, जिनके सुझाव पर यह मीट हुई वह इन दिनों ब्लागिंग से हर माह १० से १२ हजार रुपए कमा लेते हैं। अभिषेक वेद और समीर रेलन ने तो सेक्टर ३५ में बच्चों के लिए ब्लागिंग की कार्यशाला भी लगाई। भविष्य में वे और भी वर्कशाप लगाना चाहते हैं।
Saturday, June 28, 2008
रॉक गार्डन

हम सब अपना एक रॉक गार्डन बनाते हैं
अनुभवों के कबाड़ से
चुनकर लाते हैं
काई जमीं यादें
उन्हें रगड़ कर साफ करते हैं
जिंदगी के सांचे में फिर से सजाते हैं
और बच्चों पर चिल्लाते हैं
देखो बेवकूफ, तुमने कबाड़ समझकर बाहर डाल दी थी जिसकी चारपाई उसके पास अब भी बहुत कुछ ऐसा है
जो तुम्हारी आंखें चुंधिया सकता है
और कर सकता तुम्हारी नई दुनिया को भी फीका
तुम्हारे मल्टीप्लेक्स और मॉल की भीड़ को जब जरूरत होती है सकून की तब वह अपनी जड़ों को खोजेने मेरे पास ही आएगी
मैं बुढ़ापा नहीं
यादों का रॉक गार्डन हूं
सबको आना होगा मेरे पास
यह दम्भ नहीं
मेरा आकर्षण बोल रहा है।
-सुधीर राघव
Sunday, June 22, 2008
chandigarh
सोहणी सिटी चंडीगढ़ में कुछ तसवीरें और बदलने वाली हैं। पहली तो यह कि सभी सरकारी कार्यालयों से कैश काउंटर खत्म होने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में पैसे जमा करवाने पर पब्लिक को बाबुओं के नखरों से भी दो-चार होना पड़ता था। यह भी भरोसा नहीं था कि जमा कराया पैसा तत्काल एकाउंट में जा रहा है या नहीं। इस तरह के कई घोटाले भी सामने आ चुके हैं। अब पब्लिक संपर्क केंद्रों पर पैसे जमा करा सकेगी। इसके अलावा संपर्क सेंटरों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।इसके अलावा चंडीगढ़ एयरपोर्ट की तस्वीर भी बदलने जा रही है। अब चेक-इन के लिए आपको लाइनों में नहीं लगना होगा। एयरपोर्ट पर ऐसी मोबाइल मशीनें और क्रिआस्क लगाए जा रहे हैं, जहां से आपको अपना बोर्ड पास मिल सकेगा। इसके अलावा सीट चुनने का विकल्प भी आपको सीधे मोनिटर पर मिलेगा।
Friday, June 20, 2008
kavita
बहाना
सोचता हूं, घर से बाहर निकलूं
पर कहां?
घर से बाहर हैं घरों की कतारें
इनके बीच सड़कों पर रेंगती भीड़
कुछ पेड़ हैं, जो लगा दिए गए हैं किनारे।
सोचता हूं, इस शहर से बाहर चलूं पर कहां?
शहर के बाहर बसे हैं बहुतेरे शहर
इनके बीच दौड़ती है भूख इनसान का भेस बनाकर
कुछ खेत हैं, जो चढ़ने वाले हैं किसी सेज (अब सेठ नहीं) की नजर।
सोचता हूं, देश से बाहर उड़ूं पर कहां?
देश के बाहर हैं बहुत से देश
इनके बीच के समन्दर पर तभी पुल बनता है जब जीतनी हो कोई जंग
कुछ कश्तियां हैं पर अलग हैं सबके भेस।
यह मेरी जड़ता है
या मुझमें नहीं है इतनी भूख कि निकल सकूं
इस घर
इस शहर
या
देश से बाहर।
-सुधीर राघव
सोचता हूं, घर से बाहर निकलूं
पर कहां?
घर से बाहर हैं घरों की कतारें
इनके बीच सड़कों पर रेंगती भीड़
कुछ पेड़ हैं, जो लगा दिए गए हैं किनारे।
सोचता हूं, इस शहर से बाहर चलूं पर कहां?
शहर के बाहर बसे हैं बहुतेरे शहर
इनके बीच दौड़ती है भूख इनसान का भेस बनाकर
कुछ खेत हैं, जो चढ़ने वाले हैं किसी सेज (अब सेठ नहीं) की नजर।
सोचता हूं, देश से बाहर उड़ूं पर कहां?
देश के बाहर हैं बहुत से देश
इनके बीच के समन्दर पर तभी पुल बनता है जब जीतनी हो कोई जंग
कुछ कश्तियां हैं पर अलग हैं सबके भेस।
यह मेरी जड़ता है
या मुझमें नहीं है इतनी भूख कि निकल सकूं
इस घर
इस शहर
या
देश से बाहर।
-सुधीर राघव
Wednesday, June 18, 2008
hello chandigarh
इस शहर की खुली हथेली पर
चौड़ी सड़कें
जैसे मजबूत भाग्य रेखा
इन पर चल कर
युवा खोज लाते हैं
अपनी मंिजल
यह मैं नहीं कहता
लोकसेवा
आईआईटी
एमबीए
एग्जाम के हर साल
आंकड़े बोलते हैं

चौड़ी सड़कें
जैसे मजबूत भाग्य रेखा
इन पर चल कर
युवा खोज लाते हैं
अपनी मंिजल
यह मैं नहीं कहता
लोकसेवा
आईआईटी
एमबीए
एग्जाम के हर साल
आंकड़े बोलते हैं

is shahar ki khuli hatheli par
chaurhi shadken
jese majboot bhagy rekha
in par chal kar
yuva khooj late hain
apni manjil
ye main nahi kehata
Civil Services
IIT
MBA
exam ke har sal ankde
boolte hain
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